Sukun ki talaash men ham dil bechne nikle the

मेरी हर आह को वाह मिली है यहाँ…..
कौन कहता है दर्द बिकता नहीं है !

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तुमने समझा ही नहीं और ना समझना चाहा,
हम चाहते ही क्या थे तुमसे “तुम्हारे सिवा.

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सुकून की तलाश में हम दिल बेचने निकले थे खरीददार दर्द भी दे गया और दिल भी ले गया|.

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वो छोड़ के गए हमें,
न जाने उनकी क्या मजबूरी थी,
खुदा ने कहा इसमें उनका कोई कसूर नहीं,
ये कहानी तो मैंने लिखी ही अधूरी थी.

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एक जैसी ही दिखती थी… माचिस की वो तीलियां… कुछ ने दिये जलाये.. और कुछ ने घर..!!

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ये जीवन है…साहब…उलझेंगे नही तो सुलझेंगे कैसे…और बिखरेंगे नहीं तो निखरेंगे कैसे…!!

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जिनमें अकेले चलने के हौसले होते है…एक दिन उन्ही के पीछे काफिले होते है…!!

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उम्र भर उठाया बोझ उस कील ने, और लोग तारीफ़ तस्वीर की करते रहे..!!

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अंदाज़े से न नापिये किसी इंसान की हस्ती… ठहरे हुए दरिया अक्सर गहरे हुआ करते हैं…!!

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अकेले ही तय करने होते हैं कुछ सफर…हर सफर में…हमसफर नही होते…!!

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